देवशयनी एकादशी पूजा विधि
*आषाढ़ी एकादशी पूजा विधि*
एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। आषाढ़ी एकादशी या देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु का शयन प्रारंभ होने से पहले विधि-विधान से पूजन करने का बड़ा महत्व है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।
(1) वे श्रद्धालु जो देवशयनी एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें प्रात:काल उठकर स्नान करना चाहिए।
(2) पूजा स्थल को साफ करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर विराजमान करके भगवान का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।
(3) भगवान विष्णु को पीले वस्त्र, पीले फूल, पीला चंदन चढ़ाएं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित करें।
(4) भगवान विष्णु को पान और सुपारी अर्पित करने के बाद धूप, दीप और पुष्प
चढ़ाकर आरती उतारें और इस मंत्र द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति करें…
‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।
अर्थात हे जगन्नाथ जी! आपके निद्रित हो जाने पर संपूर्ण विश्व निद्रित
हो जाता है और आपके जाग जाने पर संपूर्ण विश्व तथा चराचर भी जाग्रत हो जाते
हैं।
(5) इस प्रकार भगवान विष्णु का पूजन करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन या फलाहार ग्रहण करें।
(6) देवशयनी एकादशी पर रात्रि में भगवान विष्णु का भजन व स्तुति करना चाहिए और स्वयं के सोने से पहले भगवान को शयन कराना चाहिए।
देवशयनी एकादशी व्रत की कथा
उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ा था । परन्तु एक समय ऐसा भी आया कि राजा मांधाता के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई । अन्न की भीषण कमी के कारण राज्य में त्राहि त्राहि होने लगी ।।
बेहाल प्रजा राजा के सामने अपना दुखड़ा लेकर पहुँचने लगी । वर्षा न होने के कारण राजा के भी यज्ञ हवन कार्यों में विघ्न पड़ने लगा था । राजा सोचने लगा कि जब वह ईश्वर की पूजा आराधना यज्ञ आदि कार्यों में निरंतर पूर्ण करता हूँ तो फिर मेरे राज्य में अकाल क्यों?।।
प्रजा के आग्रह पर राजा मान्धाता ने बहुत सोच विचार किया । राजा किसी विद्वान की खोज में निकल पड़ा जो उसकी समस्या का हल बता सके । कई ऋषि-मुनियों-तपस्वियों से मिलता हुआ राजा मान्धाता अंत में ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचा ।।
वहां राजा ने घोड़े से उतरकर अंगिरा ऋषि को प्रणाम किया । मुनि ने भी राजा को आशीर्वाद देकर उनसे आश्रम में आने का कारण पूछा । राजा ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से अपना दुःख कह डाला ।
इस युग में धर्म की सबसे अधिक उन्नति है । लोग ब्रह्म की उपासना करते हैं और केवल ब्राह्मणों को ही वेद पढ़ने का अधिकार है । परंतु आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है । इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है ।।
उस शूद्र का वध ही इस समस्या का निराकरण है । इस पर राजा कहने लगा, कि महाराज मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को किस तरह मार सकता हूं । आप इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बताइए ।।
तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! यदि तुम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो तो तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी । उस व्रत के प्रभाव से तुम्हारी प्रजा सुख प्राप्त करेगी ।।
क्योंकि इस एकादशी का व्रत सब सिद्धियों को देने वाला है । यह व्रत समस्त उपद्रवों को नाश करने वाला है । इस एकादशी का व्रत तुम प्रजा, सेवक तथा मंत्रियों सहित करो । मुनि के इस वचन को सुनकर राजा अपने नगर को वापस आया और उसने विधिपूर्वक पद्मा एकादशी का व्रत किया ।
इस व्रत के प्रभाव से राजा मान्धाता के राज्य में वर्षा हुई और प्रजा को सुख पहुंचा । इस व्रत के प्रभाव से सभी युगों में लोग अपनी-अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करते आये हैं । इस व्रत को जो भी श्रध्हपुर्वक करता है, उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण हो जाती है ।
पुराणों के अनुसार विष्णु चार मास सुतल में निवास कर बलि को दिया वचन निभाते हैं।वामन अवतार में भगवान विष्णु ने दान के लिए प्रसिद्ध दैत्यराज बलि से तीन पग जमीन मांगी थी। राजा बलि द्वारा वचन देने के बाद विष्णु ने एक पग में पृथ्वी, आकाश और दिशाओं को नाप लिया तथा दूसरे पग में स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरा पग रखने के लिए बलि ने अपने आपको समर्पित कर दिया। इससे खुश होकर विष्णु ने बलि से वर मांगने को कहा।
बलि ने कहा आप हमेशा मेरे यहां निवास करेंगे। तब लक्ष्मी ने अपने स्वामी को बलि के बंधन से बचाने के लिए उसे रक्षासूत्र बांध कर भाई बना लिया और स्वामी को वचन से मुक्त करने का निवेदन किया। बलि ने उन्हें वचन मुक्त तो किया पर चार माह तक सुतल लोक में रहने का वचन ले लिया।
तभी से विष्णु द्वारा दिए गए वचन का पालन ब्रह्मï
और महेश भी करते हैं। पुराणों में मान्यता है कि ब्रह्मï, विष्णु और महेश
बारी-बारी से शयन करते हैं। विष्णु के बाद महेश अर्थात शंकर महाशिवरात्रि
तक और ब्रह्मï शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी, चार-चार माह तक सुतल यानी भूमि
के अंदर निवास करते हैं।
सभी एकादशियों के नाम -
चैत्र: पापमोचनी एकादशी, कामदा एकादशी
वैशाख: वरुथिनी एकादशी, मोहिनी एकादशी
ज्येष्ठ: अपरा एकादशी, पाण्डव निर्जला एकादशी
आषाढ: योगिनी एकादशी, देवशयनी एकादशी
श्रावण: कामिका एकादशी, पुत्रदा / पवित्रा एकादशी
भाद्रपद: अजा एकादशी, पार्श्व एकादशी
अश्विन्: इंदिरा एकादशी, पापांकुशा एकादशी
कार्तिक: रमा एकादशी, देवोत्थान / प्रबोधिनी एकादशी
मार्गशीर्ष: उत्पन्ना एकादशी, मोक्षदा एकादशी
पौष: सफला एकादशी, पौष पुत्रदा / पवित्रा एकादशी
माघ: षटतिला एकादशी, जया / भैमी एकादशी
फाल्गुन: विजया एकादशी, आमलकी एकादशी
अधिक: पद्मिनी एकादशी, परमा एकादशी


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